किराए की छत से अपने आशियाने तक, 40 वर्षों के संघर्ष को मिला सुकून

किराए की छत से अपने आशियाने तक, 40 वर्षों के संघर्ष को मिला सुकून

TheCityReportNews@Chhattisgarh/Bhilai-Durg कुछ सपने उम्र के साथ बूढ़े नहीं होते। वे मन के किसी कोने में उम्मीद बनकर जीवित रहते हैं। अपने घर का सपना भी ऐसा ही सपना है—एक ऐसी छत, जिसे इंसान पूरे अधिकार और आत्मसम्मान के साथ अपना कह सके। दुर्ग के आशा नगर, हरिनगर की रहने वाली सीता बाई देवांगन और उनके पति जीवन लाल देवांगन ने इस सपने को अपनी जिंदगी के लगभग चार दशक समर्पित किए। आज जब उनके सिर पर अपनी पक्की छत है, तो यह सिर्फ एक मकान नहीं, बल्कि वर्षों के संघर्ष, त्याग, मेहनत और उम्मीद के बाद मिली सुकून की छाँव है। 35-40 वर्ष पूर्व सीता बाई और उनके पति रोजगार की तलाश में दुर्ग आए थे। सीमित साधनों के साथ उन्होंने एक नए शहर में अपनी जिंदगी शुरू की। आमदनी कम थी, जिम्मेदारियाँ बड़ी थीं और भविष्य अनिश्चित था। वर्षों तक किराए के मकान में रहते हुए परिवार की जरूरतें पूरी करना ही उनकी पहली प्राथमिकता रही

आमदनी कम थी, जिम्मेदारियाँ बड़ी थीं और भविष्य अनिश्चित था...

सीता बाई फल बेचकर परिवार की आजीविका में योगदान देती रहीं, वहीं श्री जीवन लाल सिलाई का काम करते रहे। मेहनत दोनों की दिनचर्या थी और परिवार उनका सबसे बड़ा संबल। फिर वह दिन आया, जब वर्षों से आँखों में संजोया सपना हकीकत में बदल गया। प्रधानमंत्री आवास योजना के माध्यम से सीता बाई देवांगन और उनके परिवार को अपना पक्का घर मिला। घर की चौखट पर कदम रखते समय उनके लिए यह सिर्फ नए मकान में प्रवेश नहीं था,बल्कि उन तमाम वर्षों की थकान के बाद मिली राहत थी, जब उन्होंने किराए की छत के नीचे अपने परिवार का भविष्य संवारा था। आज सीता बाई के घर की दीवारों में केवल ईंट, सीमेंट और गारे की मजबूती नहीं है, बल्कि इनमें उनके जीवन की कहानी बसी है। आज अपनी छत के नीचे बैठकर सीता बाई को वह सुकून मिलता है, जिसे शब्दों में पूरी तरह व्यक्त करना शायद संभव नहीं। कभी किराए की छत के नीचे भविष्य की चिंता थी, आज अपनी छत के नीचे भविष्य का भरोसा है। ===

← Back to Home